बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

किसी को इतना भी न डराओ कि डर ही खत्म हो जाये.


आज सुबह जब सो कर उठा तो रोज की तरह बेड-टी के साथ टीवी पर समाचार देखने लगा। सारे समाचार चैनलों पर अरविन्द केजरीवाल के जीत के चर्चे चल रहे थे, कि किस मेहनत एवं लगन से उसने तथाकथित लहर को रोक दिया और केजरीवाल सूनामी से सब रिकाॅर्ड ध्वस्त कर दिये। इसी बीच चैनल बदलते-बदलते ई-टीवी समाचार पर उंगली रूक गई। राजधानी देहरादून में कोई महानुभाव नेताजी एक सिपाई से हाथापाई कर रहे थे, हाथापाई क्या मार पीट हो रही थी। सिपाई की वर्दी फटी हुई थी और वह वायरलैस सेट पर किसी उच्चाधिकारी को बुलाने गुहार कर रहा था। एक-दो अन्य पुलिसकर्मी उसे बचाने की कोशिश कर रहे थे और अतिमहानुभाव नेताजी और उनके साथ अन्य विशिष्ट महानुभाव व्यक्ति, सिपाही को झिंझोड़ रहे थे। मामला शायद पार्किंग को लेकर था। मुझे इस पूरे परिक्रम पर पुलिसकर्मी पर अत्यधिक गुस्सा आया कि कैसे उसने बिना जाने एक सत्ताधारी पार्टी के नेताजी के वाहन को छूने की हिम्मत की। उसे मालूम होना चाहिए कि ऐसे व्यक्ति विशेष के वाहनों को छूने के लिए आप अस्पृश्य हैं। भले ही वह कितनी भी पार्किंग अव्यवस्था फैला रहे हो, इनका चालान काटने के बजाय पुलिसकर्मी को चाहिए कि उस वाहन की देखरेख करे। अरे देहरादून जैसे शहर में पोस्टिंग हुई है। कम बड़ी बात है क्या। भई यहां तुम्हारे बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं, यहां तुम अपने बीवी-बच्चों के साथ जिस भी स्थिति में रह रहे हो, कम-स-कम साथ तो हो। ज्यादा चीं-चां-चूं की तो भेज दिया जायेगा पिथौरागढ़ या चमोली। जिसे आपकी पुलिसिया भाषा में कालापानी समझकर धमकाया जाता है। 
          इसी पूरे मसले पर मुझे अपनी ट्रेंनिग का एक प्रसंग याद आया। बात जनवरी 2008 की है। मैं तब हरिद्वार में प्रशिक्षणाधीन था। कोई 15-20 दिन हुए होंगे ट्रेंनिग में आये हुए। हरिद्वार के सी0सी0आर0 में तत्कालीन डी0आई0जी0 श्री अशोक कुमार जी एवं तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री मुरूगेशन जी द्वारा पुलिसकर्मियों हेतु एक नाटक का मंचन करवाया। जिसमें एक सिपाही रात की ड्यूटी कर सुबह-सुबह थाने पहंुचता है और अपने मुंशी एवं दीवान जी को बताता है कि उसकी बच्ची बीमार है और उसे उसके ईलाज हेतु गांव जाना है। निरीक्षक महोदय के मुंशी  जी उससे कहते हैं कि फलां जगह जाकर कोई काम निपटा आये फिर निरीक्षक महोदय को अवगत करायेगे आपकी छुट्टी के लिए। वह घण्टे-दो-घण्टे उस काम को निपटाता है और फिर से गुहार-मनुहार करता है कि वह गांव नहीं गया तो उसकी बच्ची का ईलाज समय समय पर नहीं हो पायेगा। लेकिन उसे कहा जाता है कि इंस्पेक्टर साहब राउण्ड पर हैं, तब तक वह दो घण्टा पहरा ड्यूटी कर दे। इसी बीच थाने में कोई नेता जी अपने 2-3 सिपहसलाहों के साथ आते हैं और रौब से निरीक्षक महोदय के कक्ष में बैठ जाते हैं। उसी सिपाही को फरमान सुनाया जाता है कि नेता जी के लिए चाय-पानी का बंदोबस्त किया जाये, वह करता भी है। तभी किसी बात पर नेताजी उस सिपाही पर नाराज हो जाते हैं और उसका काॅलर पकड़ते हैं, एवं कहासुनी में सिपाही और नेताजी की हाथापाई हो जाती है। और इसी बीच इंस्पेक्टर महोदय थाने में प्रवेश करते हैं और सिपाही को सस्पैण्ड कर देते हैं। 
इस नाटक को देखने हेतु हरिद्वार जनपद के लगभग सभी थाना प्रभारी/कर्मचारी उपस्थित थे। डी0आई0जी0 साहब ने सभी से बारी-बारी से प्रश्न किये कि इस पूरे नाटक मंचन पर उन्होंने क्या महसूस किया। सभी अपनी-अपनी राय दें। सभी थाना प्रभारियों ने एक ही रटा रटाया जवाब दिया कि सिपाही को संयम रखना चाहिए। लगभग सभी ने सिपाही को ही गलत ठहराया कि यदि वह संयम रखता तो यह घटना न होती। उसे किसी भी परिस्थिति में संयम रखना चाहिए था। यकीन मानिये उन सभी के जवाबों को सुनकर उस दिन मेरा सारा भ्रम टूट गया कि बेटा यहां जिन्दगी आसान नहीं होने वाली। उसी दिन महसूस हो गया था कि मैं गलत जगह आ गया हूं जहां पर सीखी-सीखी मानसिकता वाला ढर्रा चलता है, जहां तानाशाही है तो आपका शोषण भी है। 
मुझे तक समझ आ गया था कि इस पूरे नाटक में सिपाही की गलती नहीं ठहराई जा सकती। संयम होना चाहिए लेकिन संयम का भी एक निश्चित पैमाना होता है। किसी न किसी बिन्दु पर पैमाना छलक ही जायेगा। वह बेचारा छुट्टी के लिए परेशान है लेकिन उसे कोल्हू के बैल की तरह घुमाया जा रहा है। बेहद बुरा लगा उस दिन कि क्या मैं भी ऐसे ही बैल बनने वाला हूँ । निराशा तब ज्यादा हुई जब किसी भी अधिकारी ने उस नाटक की आत्मा तक पहुंचने का प्रयत्न नहीं किया कि वह पुलिसकर्मी किस परिस्थिति में है और उसे किस तरह मदद पहुंचाई जाये।
कल की देहरादून की घटना हू-ब-हू इसी परिदृश्य में देखी जा सकती है। पुलिसकर्मी को पूरे 12 घण्टे ड्यूटी करनी होती है। उसकी संयमता को हर दूसरे मिनट परखा जाता है। उत्तराखण्ड बनने के कुछ नफे नुकसानों में यह सबसे बड़ा नुकसान हो गया है कि हर गली कूच्चों में कुकुरमुत्तों की तरह छुटभैये नेता पनप गये हैं। विधायक जी की इतनी बुरी गत हो गई है कि मोटर-साईकिल का चालान तक छुड़वाने के लिए थाने में फोन कर देते हैं। कुछ तो गरिमा रखो भाई!
उत्तराखण्ड राज्य में पुलिसकर्मी की छुटभैये नेताओं और कभी-कभी अपने वरिष्ठ अधिकारी की तानाशाही इसलिए सहन करनी पड़ती है कि वह लाचार कम पर मजबूर ज्यादा है। वह अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहता है, अच्छी शिक्षा देना चाहता है। गढ़वाल मण्डल में हरिद्वार एवं देहरादून तथा कुमाऊं मण्डल ऊधमसिंह नगर व नैनीताल जिले में ही अच्छी शिक्षा एवं रहने की उचित व्यवस्था है। इसीलिए वह 12 घण्टे की लगातार ड्यूटी और सबकी तानाशाही सहता है कि अगर उसने ज़रा सा भी विरोध (विद्रोह) किया तो सीधे कालापानी (चमोली, पिथौरागढ़) पहुंचा दिया जायेगा। वह इसी लालच में कोल्हू का बैल बना फिरता है कि  शाम को जब अपने घर जाये तो परिवार के साथ सुकून से समय बिताये और उसके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और कम से कम  उसके जैसा न बनें।

" अनकहा सा कुछ ..." ________________________________________   2001 अगस्त माह की एक सुबह , बाहर बारिश हो रही थी , लेकिन आसमान...