गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

 

                            मन का दूल्हा न दिया


चांदी दिया, सोना दिया
हीरों का हार, 
साड़ियों का जोड़ा दिया
चुनरी दी, खूब महंगा लहंगा दिया
सब कुछ दिया पापा तुमने
पर मन का दूल्हा न दिया।
 
तुम वो बाबा नहीं मेरे
जो हर बात पर पलकें बिछा दिया करते थे,
मेरी हर उदासी को अपने कहकहों से मिटा दिया करते थे,
मेरी खुशियों की खातिर कितना परेशां हुआ करते थे,
रात भर  मेरे माथे पर थपकियाँ दिया करते थे,
जीवन तो दिया बाबा तुमने
पर मन का जीवनसाथी न दिया
सब कुछ दिया पापा तुमने
पर मन का दूल्हा न दिया।
 
मैं कहती रही तुम सुनते रहे
पहले सबसे अपने थे, पर आज अजनबी से लगे
मां से शिकायत नहीं, वो तो कह कह के थक गई थी
मेरे आंखों के पानी का खारापन समझ गई थी
तुम और भाई तो ऐसे नहीं थे
मेरे लिए तुम कभी इतने अजनबी तो नहीं थे,
दुनिया की खातिर तुम मुझे मेरी दुनिया न दे सके
जब सबसे ज्यादा जरूरत थी आपकी
तभी हाथ अपना पीछे खींच लिया
सब कुछ दिया पापा तुमने
पर मन का दूल्हा न दिया।
 
बचपन में मेरी हर बात मान जाते थे
कहो क्या चाहिए, सबसे पहले मुझसे पूछा करते थे
मैं कैसे समझाऊँ आपको कि, 
मैं कोई इज़्ज़त की कोई चीज नहीं हूँ
मैं बेटी हूँ तुम्हारी, कोई सामान नहीं हूँ
मैं कहती रही कि उस बिन जी तो लूँगी
पर जी न सकूँगी,
बिन उसके मन कस्तूरी सी वन-वन फिरूँगी
सरकारी नौकरी, बंगला गाड़ी से
तुमने मुझे ब्याह तो दिया,
लेकिन उम्र भर टीस तुम्हे भी रहेगी कि
सब कुछ दिया तुमने

पर एक मन का दूल्हा न दिया।


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