मायूस आंखें, उजाड़ बाल,
चेहरे पर स्याह सी खामोशी थी,
वो एक अनगढ़ सी लड़की
जो सिग्नल पर खड़ी थी।
उम्र बारह लेकिन
बातों में भारीपन लिये हुये थी,
चेहरा बता रहा था कि
सुबह से भूखे पेट खड़ी थी।
कहा कि बाप छोड़ गया
मां बीमार रहती है,
भाई स्कूल और वो सबके लिए
दर-ब-दर रहती है,
सिग्नल पर खड़ी गाड़ियों की खिड़की से
झांक कर देख रही थी
वो शीशे की दीवारों के पीछे
इंसानों के कसैलेपल को महसूस कर रही थी।
ये खानाबदोशी तो उसने
अपने लिये नहीं चुनी थी
वो बचपने की मासूमियत को
सड़कों पर बेच रही थी।
बेचैन आंखें, फटे कपडे, मासूम निगाहें
गाड़ियों के शीशों से झाँककर सबकी
हैसियत तोल रही थी,
वो भूख की शहज़ादी
किसी गाड़ी के खुले शीशों से निकले चन्द सिक्कों में
अपनी रात की नींद देख रही थी।
वो एक अनगढ़ सी लड़की
जो सिग्नल पर खड़ी थी।
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