शनिवार, 21 अगस्त 2021

मुल्क- सबकी मिल्कियत

 


मैं इश्क़ हूँ मुझे आसान रहने दे
मैं हवा हूँ मुझे आज़ाद बहने दे
मैं नहीं हो सकता तेरे जैसा
मुझे फ़क़त एक इंसान रहने दे।

तू देखता है जिसे लिबास के हिसाब से
उस नादान को एक जान रहने दे।
यूं जो हर बात पे तू त्योरियां चढ़ाए रहता है
अपने गुस्से को ज़रा ईमान में रहने दे।

हर तरफ धूल है, कीचड़ है , सड़ाँध है तेरे झंडे की
मुझे न खींच इसमें, मुझे बच्चे सा इंसान रहने दे।
तू जो हर बात पे कहता है, की तू क्या है
ला मुझे अपने अंदर एक मासूम सी जान देखने दे।

हिन्दू-मुस्लिम के अलावा भी कई और गम हैं यहां
जरा शिक्षा, स्वास्थ्य, से गमों से तेरी पहचान करने दे।
एकरंग हो जाएगा ये गुलिस्तां एक दिन,
तेरे उकताने से पहले हर रंग में खुद को घुल जाने दे।

मेरी हर ख्वाहिश का खैरगाह है तू,
मेरी हर उम्मीद का सरताज है तू
एक तू ही है जो हर मुश्किलों से पार पा सकता है,
एक बार तो सही खुद को खुद सा तो हो जाने दे।

मैं जानता हूँ कि तू नहीं है वैसा, जैसा दिखावा करता है
एक बार तो सही आईने में खुद को झांकने दे।
ख़त्म हो जाएंगी कौमे एक दिन तेरी जिद में
आ बैठ जरा, खुद को आबाद तो होने दे।

" अनकहा सा कुछ ..." ________________________________________   2001 अगस्त माह की एक सुबह , बाहर बारिश हो रही थी , लेकिन आसमान...