आज भी याद है ट्रेनिंग का वो पहला दिन, बड़ा अजीब सा दिन था वो सब लोग अपने बक्से, अटेची, बैग लेकर पूरे मैदान में भटक रहे थे कि, रात को किस बेरिक में सोना है, मैं शाम को ४ बजे पहुंचा, अपने ट्रेनिंग सेन्टर में. हर कोई अजनबी सा, किसी से जान पहचान नहीं, फिर मैं था ही थोडा रिजर्व टाइप का, किसी से बात नहीं, बस चुपचाप सा बैठा रहा अपने बक्से के ऊपर, और किसी आर्डर का इंतजार कर रहा था, दिल्ली शहर के पले बड़े थे, एक अच्छी कंपनी में अच्छी खासी जॉब थी, आज तक समझ नहीं आया की क्यों आया मैं वहां से छोड़-छाड़ के, घर की रोटी हज़म नहीं हुई थी शायद, उस वक़्त सोचा था की कहाँ मिलती है गवर्नमेंट जॉब आजकल.... तो चले जाते हैं,..
मुझे बैठे-बैठे शाम के ६.३० बज चुके थे तब तक, सब इधर उधर भाग रहे थे, अपना सामान रख रहे थे, बेरिक में अपनी मनपसंद जगह कब्ज़ा रहे थे....मुझे लगा की कोई ऑफिसर्स आयेंगे और हमें हमारी जगहों के बारे में बताएँगे की कहाँ सोना है,, कहाँ सामान रखना है, जैसा फिल्मो में देखा था की ट्रेनिंग में सबसे पहले ३ लाइन में खड़ा करते हैं और आर्डर देते हैं.. तभी एक लड़के ने आवाज दी,
ओ देवदास, भाई तने नि सोणा कहीं, इंगे ही काटनी है क्या पूरी रात?.. पहले तो मैंने सोचा की इसे बोलूं कि तमीज नहीं है क्या बात करने की, एक अजनबी से बात इस तरह से की जाती है, लेकिन फिर लगा कि ठीक ही तो कह रहा है, मैंने उससे पूछा, कहाँ रखना है सामान?... उसने कहा आओ मेरे साथ.. उसने मेरा बैग पकड़ा और बक्सा मैंने खुद पकड़ा, अभी तक दिल्ली से देहरादून तक पूरे सफ़र में मैंने बक्से को बिलकुल हाथ भी नहीं लगाया था, पहले कुली किया फिर ऑटो वाला रख गया सामान यहाँ ट्रेनिंग सेन्टर तक ....
जब मैंने बक्सा उठाया, गुस्सा आया भाभी पर,,, कितना भर-भर के सामान भेजा है इसमें. लेकिन अगले कुछ दिनों बाद भाभी को पता नहीं कितनी बार थैंक्स बोला होगा...खूब घी रखा था, बादाम, किशमिश, छुआरे, काजू,..... भाभी बहुत प्यार करती है, सबसे ज्यादा वही रोई थे मेरे जाने से, मैं तीसरी क्लास में था जब भाभी आई थी घर हमारे...मैं हर वक़्त उनके ही साथ रहता था उनके लिए हमेशा छोटा बच्चा रहा हमेशा और आज भी वैसा ही हूँ....
फिर मैंने बक्सा उठाया जैसे तैसे, रखा एक कोने में, किस्मत से मुझे कोने वाली सीट मिल गयी थी, तब उस लड़के ने मेरा बैग रखा, मैंने उसका नाम पूछा, उसका नाम सचिन था, और आज भी वो मेरा अच्छा दोस्त है, वो haridwar के किसी देहात के गाँव से था, जहाँ की भाषा हम लोग सुने तो किसी गाली से कम नहीं लगती थी,,, पहले तो समझ नहीं आया की ये इंगे तिंगे क्या होता है... खैर उससे उसके बारे में पूछा,...फिर अपना सामान रखा.. मैं अपनी ट्रेनिग का सबसे नोसीखिया था, कुछ भी नहीं आता था, मैं किसी से बात नहीं करता था, बस चुपचाप. ऐसे ही जमीन में जैसे तैसे बिस्तर लगाया, और बैठ गया... तभी एक सीटी बजी और सब भागने लगे, पूछा तो पता चला की ये ७.३० बजे की रोल कॉल है, (रोल कॉल- शाम की आखिरी परेड होती है जिसमे सबसे कुशलता पूछी जाती है और अगले दिन के लिए आर्डर सुनाये जाते हैं,)
ऑफिसर्स आये और कुछ डांट सुने, कुछ हिदायते दी और कहा की खाना खा सकते हो अब...... गए हम सब खाना खाने.... खाने में पालक और आलू थे, पालक पूरे के पूरे थे, और आलू साबूत थे, उन लोगो ने बिलकुल भी जहमत नहीं उठाई,,, कि आलू काटने भी होते है.... वो खाना आज भी याद है.. और मेरे जैसे नखरेबाज के लिए तो वो सबसे बुरा खाना था...घर में सबसे छोटा था, तो खूब सारे नखरे होते थे खाने में, जब तक खाने में थोडा पनीर नहीं होता था तो खाया नहीं लगता था... उस दिन उस खाने को देख कर आंसू भी आये थे... बहुत याद आई थी घर की उस दिन, पहली बार घर के खाने की अहमियत पता चली.. उस दिन गुस्सा आया खुद पर क्यों मैं 50 नखरे करता था घर के खाने में. लेकिन आज भी लौकी, तोरी, बेंगन वगेरह खूब सारी सब्जियों से नाक-मुहं सिकोड़ लेता हूँ,...
फिर सुबह जब ४ बजे लड़के इधर उधर भागने लगे कि दौड़ने जाना है सुबह ५ बजे तो हालत ख़राब हो गई, अरे मैं तो ४ बजे तब भी नहीं जागा जब १०वी या १२वी के पेपर दिए थे. फिर जैसे तैसे जागे.. बहुत बुरे वाले टोइलेट में आँख बंद करके घुसे. और जब दोड़ने गए तो हालत ख़राब...पहले लाइन में खड़े हुए, फिर एक पी०टी०आई० आया उसने पहले तो ७ चक्कर मरवाए पूरे मैदान के. फिर उन दो घंटो में ऐसी हालत ख़राब कर दी कि हाथ पैर संभाल नहीं पाए थे अगले कुछ दिनों तक...
फिर सुबह का दलिया भागते-भागते, दिन का खाना दौड़ते- दौड़ते खाना होता था....
बस एक शाम का वक़्त ही ऐसा होता था जब जरा सुकून से खाया जाता था... फिर उन दिनों अकेले-अकेले खाया फिर लग गए अपनी डायरी के साथ...
लेकिन उस वक़्त ने बहुत कुछ सिखाया,,,,,,,,,,बहुत कुछ खोया बहुत कुछ पाया....
फिर सुबह जब ४ बजे लड़के इधर उधर भागने लगे कि दौड़ने जाना है सुबह ५ बजे तो हालत ख़राब हो गई, अरे मैं तो ४ बजे तब भी नहीं जागा जब १०वी या १२वी के पेपर दिए थे. फिर जैसे तैसे जागे.. बहुत बुरे वाले टोइलेट में आँख बंद करके घुसे. और जब दोड़ने गए तो हालत ख़राब...पहले लाइन में खड़े हुए, फिर एक पी०टी०आई० आया उसने पहले तो ७ चक्कर मरवाए पूरे मैदान के. फिर उन दो घंटो में ऐसी हालत ख़राब कर दी कि हाथ पैर संभाल नहीं पाए थे अगले कुछ दिनों तक...
फिर सुबह का दलिया भागते-भागते, दिन का खाना दौड़ते- दौड़ते खाना होता था....
बस एक शाम का वक़्त ही ऐसा होता था जब जरा सुकून से खाया जाता था... फिर उन दिनों अकेले-अकेले खाया फिर लग गए अपनी डायरी के साथ...
लेकिन उस वक़्त ने बहुत कुछ सिखाया,,,,,,,,,,बहुत कुछ खोया बहुत कुछ पाया....
लगता है ट्रेनिंग से छुट्टी नहीं मिली..रोजनामचा बेहद दिलचस्प है. फुर्सत मिले तो फिर एक पोस्ट होनी चाहिए...काफी महीने हो गए.
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