अभी रात के 12 बज रहें हैं, लाईफ ओके चैनल पर सावधान इण्डिया आ रहा है। एक लड़की की कहानी जो छेड़छाड़ की शिकार है। बुद्धिमान लड़की स्कूल टॉप करने के बाद एक नये शहर आगे पढने आती है, पिताजी लकवा के मरीज हैं जो दिन भर चारपाई पर लेटे होते हैं कुछ बोल नहीं पाते। मां अजीब सी जो इज्जत के नाम पर बेटी को ये सब सहते रहने को कहती है, जिसका बोलना पिताजी के न बोल पाने से भी ज्यादा अखरता है, 15 साल का छोटा भाई और पूरी कहानी का सबसे दयनीय और सहमुख्य पात्र। रोज आते जाते लड़की को हर प्रकार से छेड़ा जाता है, आस-पास के लोग इसलिए कुछ नहीं कहते कि हमें, किसी लफडे में नहीं पडना है। मां इसलिए चुप कि लोग क्या कहेंगे।
लडकी अच्छे कपडे पहनना इसलिए बंद कर देती है कि अगर बुरी दिखुगी तो छेडना बंद कर देगें। साथ की सहेलियां इसलिए परेशान कि तुझे ही क्यों छेडते हैं। 15 साल का छोटा भाई इसलिए दयनीय पात्र कि वो बडी बहन को सुरक्षित आने जाने के लिए अपनी पढाई छोड उसे मो0 सा0 से कालेज से आना जाना साथ करता है। पुलिस इन्सपेक्टर से कम्पलेट करते हैं तो वो ये कह कर भगा देते हैं कि जब तुम्हें उस रास्ते वो लोग छेडते हैं तो तुम उसी रास्ते क्यों जाते हो।
15 साल के छोटे भाई को बीच सड़क पर चाकुओं से गोदा जाता है बहन को बेइज्जत किया जाता है लेकिन किसी अधिकारी के बंगला डयूटी पर तैनात होमगार्ड महोदय सामने चौराहे पर खून होते देखते हुए भी कोई मदद नहीं देते क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी जाने का खतरा है। छोटा भाई बीच रास्ते खून से लथपथ है लेकिन किसी को लफडे में नहीं पडना इसलिए होस्पिटल नहीं पहुंचाते। एक ठेली वाला जैसे तैसे होस्पिटल पहुँचाता है लेकिन डा0 साहब तत्काल इलाज के बजाय पहले पुलिस को बुलावा देना पंसद करते हैं। पुलिस आती है लेकिन बड़े अदभुत तरीके से वो भी उन गुण्डो के विषय में न पूछकर इस बात पर अपना ध्यान प्रकट करती है कि एक 15 साल का लडका बिना लाईसेन्स के मो0सा0 कैसे चला रहा था। इसी बीच अचानक डा0 साहेब की इन्ट्री होती है और हिन्दी फिल्मों की तरह अपना रटा-रटाया डायलाग बोलती है ‘‘माफ करना समय से इलाज न होने पर हम उसे बचा न सके’’..... अजीब वाकिया।
वैसे मैं ऐसे ‘‘सच्ची घटनाओं पर आधारित कार्यक्रम’’ कम देखता हूं क्योंकि बेवजह इमोशनल हो जाता हूं। इस एपिसोड को इस लिए देखा कि चैनल चेन्ज करते वक्त पुलिस वाले दरोगा जी लड़की को ज्ञान दे रहे थे कि इस रास्ते क्यों जाते हो वगैरह, इस लिए पूरे एपिसोड को देखना पड़ा। अब इसे देखते देखते मेरे मन में कई सवाल उमड पड़े। क्या वाकई पुलिस इतनी असहिष्णु या कहें कि गैर जिम्मेदार होती है?
6 साल के उत्तराखण्ड पुलिस के अपने पुलिसिया काल में मैं ऐसे किसी पुलिस वाले से नहीं मिला जो इतना असंवेदनशील हो जो लड़की को ऐसी नसीहत दे रहा हो और तो और होस्पिटल में इलाज के वक्त भी लाईसेन्स के बारे में पूछ रहा हो। या ऐसे किसी डा0 से जो इतनी संवेदनशील स्थिति में भी इलाज के बजाय पहले पुलिस को बुलाना पसन्द करता हो। और यकीन मानिये मुझे पूरे ऐपिसोड में सबसे ज्यादा कोफ्त तब हुई जो बंगला ड्यूटी पर लगे होमगार्डस के सामने लडकी को बेईज्जत किया जा रहा था और छोटा भाई बडी बहन को बचाने के चक्कर में चाकुओं से गोदा जा रहा था लेकिन उन्हें अपनी नौकरी को बचाना था।
क्या वाकई ऐसा होता है? अगर हां तो अभी तक कुछ नही समझा कुछ नहीं जाना।
क्या वाकई ऐसा होता है? अगर हां तो अभी तक कुछ नही समझा कुछ नहीं जाना।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें