अपने पुलिसिया नौकरी के पांच सालों में अपने अन्दर कई बदलावों को महसूस किया है। थोड़ा बहुत मैच्योर कर दिया इन साढ़े पांच सालों ने। और कुछेक सालों से तो ज़्यादा महसूस होता है कि अब थोड़ा बड़ा हो गया हूं। कुछ दिनों से अपने अन्दर कुछ बदलाव सा भी महसूस कर रहा हूं। शायद इसलिये कि नई नौकरी लग गई तो खुमार चढ़ गया है? अरे नहीं नहीं। ऐसा कुछ नहीं हैं। शायद पुलिस में रहते हुए एक अलग सा एटीट्यूड आ जाता है, पूरे व्यवहार में ही। चाल-ढाल से ही पता चल जाता है कि कोई पुलिस वाला जा रहा है। सामान्य बातचीत में भी लगता है कि पुलिस वालों की तरह पूछताछ कर रहा है। हर बात को पुलिस वालों के नज़रिये से सुनना और समझना। और तो और, जो लोग पुलिस को बस दूर से जानते हैं, वो भी हिन्दी फिल्मों या टी.वी. सीरियलों के हर उस सीन में पुलिस वालों को पहली ही नजर में ही पहचानने लगे हैं जब वो बिना वर्दी के किसी का पीछा करते हुए या रेव पार्टी (फिल्मों वाली) में छुप कर ड्रग्स बेचने वालों की निगरानी करते हुए, पहली नजर में ही जान जाते हैं कि ज़रूर ये पुलिस वाले मामू हैं। (मामू शब्द आम बोलचाल वाली भाषा से उद्धेलित है) और मुझे तो सबसे ज्यादा शिकायत बोलिवुडिया पुलिस वालों से है, समझ नहीं आता कि कौन इनकी वर्दी का चुनाव करता है जो पुलिस इन्स्पेक्टर को भी डीआईजी की वर्दी पहना देता है, अब ये लो! भला जिसे ये नहीं पता कि किस रैंक की वर्दी कैसी होती है, वो क्या खाक पुलिसिंग करेगा।
आजकल सोचता ज़रूर हूं कि अगर पुलिस डिपार्टमेंट छोड़ कर किसी दूसरी फील्ड में जाऊंगा तो क्या-क्या मिस करूंगा। सरकारी मकान, सरकारी गाड़ी, स्पेशल ब्रांच का रूआब, नाते-रिश्तेदारों, यारों-दोस्तों और जान-पहचान वालों की आंखों में अपने लिए एक विशेष सम्मान इत्यादि। या और भी न जाने क्या क्या। वहीं दूसरी तरफ कभी मन ये भी करता है कि आखिर क्यों इतनी अच्छी नौकरी को छोड़ना, इसी में आगे बढ़ने के कुछ नये रास्ते ढूंढ लेते हैं, पर नहीं, इन तमाम सुविधाओं के बावजूद भी कुछ था जिसकी वजह से अकसर पुलिस सेवा से मन उखड़ सा जाता था। और सब से ज्यादा तब जब पुलिस सेन्सिटाईजेशन की बात हो। आये दिन हम सुनते हैं कि पुलिस का किसी गरीब पर, किसी रेप पीडि़त पर या किसी भी तरह से पीडि़त व्यक्तियों के प्रति असंवेदनशील व असहयोग का रवैया रहता है। पुलिस पीडि़तों के लिए मददगार की भूमिका कम और पीडि़तों को तंग करने वाली भूमिका अधिक निभाती है। ज़ाहिर है कि ऐसा है भी। लेकिन अपवाद तो हर मामले में मिलते हैं, ऐसे ही पुलिस विभाग में भी कुछ लोग, आॅफीसर हैं जो अपवाद की भूमिका निभाते हैं। जो आम लोगों की मदद को हमेशा तत्पर रहते हैं और अपने काम को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं। लेकिन ‘एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है’ या ‘काजल की कोठरी में जाओगे तो कालिख तो लगेगी ही’ इस तरह के मुहावरे शायद ऐसी ही परिस्थितियों के लिए बने हैं। इसलिए पुलिस वालों द्वारा आम लोगों पर की जाने वाली ज़्यादतियों के लिए सिर्फ उन कुछ दोषी व्यक्तियों को नहीं बल्कि समस्त महकमे को असंवेदनशील ठहराया जाता है, हम कहते हैं कि ‘‘पुलिस वाले तो होते ही ऐसे हैं’’। यहां तक की बालीवुड की हर फिल्म का ट्रेंड ही यही है कि सब गुंडों को हीरो ने मार दिया, हिरोइन और अपनी फैमिली को सबको बचा भी लिया तब कहीं जाकर द एंड से ज़रा पहले सायरन बजाती पुलिस का आगमन होता है। खैर! ये और बात है। अगर पुलिस टाइम पर आ जाए तो शायद बेचारे हीरो के लिए फिल्म में नाच-गा के हिरोइन को मनाने और रिझाने के अलावा कुछ और करने को ही न रहे। हाँ लेकिन ये बात उन फिल्मों पर लागू नहीं होती जहां हीरो को ही पुलिस वाला बना दिया जाता है। बहरहाल जब कुछ पुलिस वालों के किए का ठीकरा पूरे पुलिस विभाग पर फोड़ा जाता है तो उस वक्त एक खीज सी उठती है। लगता है यार मैंने क्या गलत किया। या पुलिस विभाग से जुड़े अन्य सभी लोगों ने क्या किया जो उन सबको भी इसमें घसीटा जा रहा है? मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसा क्या सबूत दूं जिससे ये प्रमाण मिले कि मैं उन कुछ पुलिस वालों जैसा नहीं हूं जो आम आदमी को मदद पहुंचाने के बजाय उस पर और अत्याचार करते हैं। कैसे ये प्रमाण दूं कि मैं भी उस पीडि़त व्यक्ति के प्रति उतना ही संवेदनशील हूं जितना कि आप या अन्य कोई और। एक बात और कि मैं यहां कुछ पुलिस वालों या अपने संवेदनशील होने की बात इसलिये नहीं कर रहा हूं कि मैंने हमेशा पुलिस हेडक्वार्टर या अन्य जगहों पर सिर्फ आॅफिशियल ड्यूटी की या हमेशा आॅफिस में ही ठाठ-बाट किये (ठाट-बाट का अभिप्राय बिना वर्दी आॅफिस जाना और 10 से 5 बजे की सेवा से है) और कभी भी थाना या वाली ड्यूटी नहीं की तो उन जगहों की ज़मीनी हकीकतों और अनुभवों के बारे में मैं नहीं जानता कि क्या सचमुच सारा पुलिस विभाग ही ऐसा है? और यदि ऐसा है तो क्यों? क्यों पुलिस असंवेदनशील होती है?
इसके जवाब में मेरा छोटा सा अनुभव यह कहता है कि पुलिस और आम जनता के बीच एक मनौवैज्ञानिक गैप बन जाता है और ये गैप पुलिस में बुढियाने के साथ-साथ बढ़ता जाता है। इस पूरे परिदृश्य में मुझे यह लगता है कि ‘आम लोगों के दिलोदिमाग में पुलिस का मतलब है एक व्यक्ति या पूरा विभाग जो हर परिस्थिति में हर हालात में हमारी सुरक्षा के लिए खड़ा है। हमारी सुरक्षा की छोटी-से-छोटी जि़म्मेदारी उसकी है और हमें पूरा हक है कि उसकी ज़रा सी चूक या लापरवाही पर हम उसकी क्लास लगा दें। उसकी सिर्फ इन जि़म्मेदारियों को याद रखने के साथ हम यह बिल्कुल भूल जाते हैं कि पुलिस विभाग में काम करने वाला हर व्यक्ति एक इंसान भी है और इसी समाज का ही एक हिस्सा है। वो हमारे-आपके परिवार से ही चुना जाता है। हममें से किसी के बहन-भाई, माता-पिता इत्यादि ही पुलिस विभाग में चयनित होते हैं। हमारी ही तरह उनकी भी एक जि़ंदगी है, एक परिवार है और परिवार के लिए उनकी कुछ जि़म्मेदारियां भी हैं। हम सिर्फ पुलिस को हमारे लिए फर्ज और जवाबदेही के नाम पर ही समझ पाते हैं, उसकी किलशन नहीं समझ पाते जब उसे 24 घण्टे पूरे सप्ताह हर वक्त तैयार रहना होता है। अब इस पर कई लोगों का तर्क है कि उसे इस बात की तनख्वाह मिलती है। तो अरे भई! तनख्वाह तो सबको मिलती है तो क्या कोई पूरे सप्ताह काम करने में खुश होगा?. वहीं पुलिस वाले जो अपनी निजी जि़ंदगी को परे छोड़ ड्यूटी निभाने में व्यस्त रहते हैं उनके और आम जनता दोनों के बीच चीजों को सोचने समझने का अन्तर सा आ जाता है। हम लोगों के लिए किसी भी पुलिस वालों की ड्यूटी एक विशेष कार्य की तरह हैं, लेकिन वही काम किसी पुलिसकर्मी के लिए रोजमर्रा की रूटीन टाईप ड््यूटी है। चाहे वो किसी गली-मुहल्ले में हो रहे झगड़ा-फसाद निपटाना हो, शहर के गुंडों-मवालियों की गतिविधियों पर नज़र रखना ताकि कहीं कोई वारदात न हो, कहीं किसी घर में मर्डर हो गया तो आस-पास के लोगों सहित पूरे परिवार पर गहरी नज़र रखना, सबसे पूछताछ करना। ये काम ऐसे हैं जो पुलिस के लिए रोजमर्रा के रूटीन टाईप ड्यूटी है, और सामान्य जनता के लिए पुलिसकर्मी कई चीजों में ज्यादा शक्की हो जाता है और वह चीजों को भावनात्मक रूप से कम और प्रेक्टिकल नजरिये से ज्यादा देखता है, इसी लिये वह कम संवेदनशील होता जाता है। और कभी कभी संवेदनशीलता ऊपर से भी नियत की जाती होगी, वरना शायद सभी मामलों पर असंवेदनशील होने का लेवल लगाया जाता।
और ऐसे बहुत से कार्य हैं जो पुलिस को करने होते हैं, शायद ऐसे भी काम जिन्हें हम लोग सोचते भी नहीं। इसके अलावा पुलिस में रहकर अपनी निजी जि़ंदगी किस तरह खत्म हो जाती है यह मैंने इस विभाग में आकर ही जाना। जब मैं प्राईवेट सेक्टर मंे था तो होली-दीवाली या अन्य किसी भी त्योहार पर बहुत खुश होता था कि मकर संक्रांति हो होली हा,े ईद हो नवरात्रे हों दशहरा, दीवाली हो या कुछ भी छोटे-मोटे त्यौहार जिनपर आमतौर पर छुट्टी हुआ करती है। दोस्तों के साथ प्लान बनाते थे कि इस दिन पार्टी करेंगे, कोई नयी मूवी देखेंगे या फिर कहीं मस्ती करेंगे। लेकिन पुलिस ज्वाईन करने के बाद कभी भी इन त्योहारों के लिए कोई आकर्षण नहीं रहा। कोई त्योहार आया नहीं कि तुगलकी फरमान सुना दिया जाता है कि फलां दिन तक छुट्टियां बंद। नवरात्रों की रातों में जब आप अपने परिवार और बच्चों के साथ दुर्गापूजा या रामलीला देखने जाते हो उस समय भी पुलिस अपने घर-परिवार से दूर आपकी खुशियों को सहेजने के लिए चैकस रहते हैं। इसी तरह बहुत से ऐसे त्यौहार हैं जो हम अपने परिवार के साथ नहीं बल्कि आप लोगों की सुरक्षा करने में मनाते हैं। और सच कहूं इसमें अन्दरूनी खुशी भी होती है। और ये मैंने हरिद्वार में कुम्भ मेला के दौरान महसूस किया। दीवाली में लोगों के घरों के आगे जलती दीये-बाती को निहारते और अपने घर की चमक-धमक याद करते। शहर में जलते बम-पटाखों से कहीं कोई नुक़सान न हो इसलिए पहरा करते और याद करते हुए कि घर में भतीजी की पहली दीवाली है कैसे मना रहे होंगे सब घरवाले उसके साथ दीवाली। कहीं वो डर तो नहीं रही होगी पटाखों की आवाज़ से। मां बार-बार बच्चों से पटाखे ध्यान से चलाने के लिए कह रही होगी। मैंने अपने साथियों को कई बार झल्लाते हुए देखा है कि इन पर्वों के कारण हमारी छुट्टियां कैंसिल हो जाती हैं वो दिन भर से परेशान कि यार घर में मां-पिताजी, पत्नी बच्चे कितना याद करते हैं बार-बार फोन आता है इस बार तो आ जाओ एक ही दिन के लिए सही। पत्नी महोदया तो करवाचैथ से ही कोपभवन में हैं। ये सब चीज़ें धीरे-धीरे कहीं न कहीं एक खीज में बदलती जाती हैं। और इसी खीज के साथ शायद वो अपनी पूरी जिन्दगी गुजार लेता है और इसी में संतुष्टि ढूंढने की कोशिश करता वैसे कभी कभी टीवी पर पुलिस रिफोर्मेशन की आहट सुनाई जाती है, लेकिन चिन्ता न करें, ये कभी होगा भी नहीं और कारणों से तो आप सभी अवगत ही हैं। एक दुआ जरूर है कि धीरे-धीरे ही सही, ये खिसियाहट खत्म हो जाये!
अब भईया पांच साल पुलिस में गुजारे हैं, तो थोड़ा तो इमोशनल अटैचमेंट तो बनता है तो वो लोग जो इससे इत्तेफाक नहीं रखते वो माफ करें।
IIMC में आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में हमें एक क्लाइंट दिया जाता है जिसके लिए टीम कम्युनिकेशन बनाती है. हमारा क्लाइंट दिल्ली पुलिस था. महकमे के सबसे ऊपर वाले अफसरों से बात की और दिल्ली पुलिस के कई लेवल के लोगों से भी बात की, इनमें क्राइम ब्रांच के लोग(या शायद उन्हें आईबी कहते थे, ठीक याद नहीं) जो डेस्क जॉब करते थे, वो भी शामिल थे. कुछ कुछ जैसा यहाँ लिखा है वैसी ही चीज़ें मालूम पड़ीं. दिल्ली पुलिस की परेशानी और भी है क्यूंकि बोलने के जिस लहजे को आम आदमी रुखाई मान लेता है, वो वहां बोलचाल का हिस्सा है. जो पुलिस वाला अपने माँ-पापा से जैसे बात करेगा उससे बेहतर तो आम इंसानों से नहीं करेगा. उससे ख़ास इज्ज़त की डिमांड क्यूँ?
जवाब देंहटाएंमेरे जीजाजी दिल्ली पुलिस में हैं. त्योहारों पर घर नहीं आने के कारण अक्सर घर में परेशानी होती है. दिवाली या होली पर कभी छुट्टी नहीं मिलती. पुलिस फ़ोर्स का एक बड़ा हिस्सा नेताओं की सुरक्षा में लगा होता है तो आम आदमी की सुरक्षा के लिये बहुत कम लोग बचते हैं. हर आम पुलिस वाला लगभग १८ घंटे की ड्यूटी अक्सर करता है. इस सब के बावजूद जनता उन्हें सम्मान की नज़र से नहीं देखती तो वाकई गुस्सा आता होगा, खीज होती होगी जो हर साल के साथ बढती जाती है.
पुलिस एक्ट के कुछ नियम ऐसे है जो १८०० के आसपास बने हैं, अंग्रेजों के बनाये हुए, ओरिजिनल. इनमें बदलाव के लिए कितने प्रयास किये गए लेकिन हमेशा डेट आगे की बढती गयी है. आज इस पोस्ट को पढ़ते हुए वैसा ही कुछ लगा.
पढ़ते हुए हालाँकि एक चीज़ और सोचती हूँ, देर तक नौकरी करना, वीकेंड्स पर काम करना आजकल आम बात हो गयी है, चाहे आईटी सेक्टर लिया जाए या हमारी तरह का क्रिएटिव फील्ड. हर जगह उम्मीद की जाती है कि ऑफिस बुलाये तो चाक चौबंद मिलें आप. छुट्टियाँ मांगने पर हर बॉस इतना दुखी होता है जैसे उसकी अपनी जेब से कुछ जा रहा हो. स्थिति बहुत अच्छी तो कहीं भी नहीं है, हाँ पुलिस वालों के लिए थोड़ी ज्यादा बुरी है.
बहरहाल, इतने के बावजूद अपना कुछ बचाए रखने की कोशिश जो इस पन्ने पर दिखती है, उसके लिए सैल्यूट. हमारी नज़र में तो बहुत अच्छी इमेज है पुलिसवालों की :)